अद्भुत भारत
- sheffalidesign
- Oct 3, 2025
- 2 min read
द्रविड़ शैली की वास्तुकला
पर्यटन के क्षेत्र में भारत वह देश है, जहाँ असीम विविधता के स्थल, व्यंजन, संस्कृति और रंग देखने को मिलते हैं। अपनी सांस्कृतिक विविधता के कारण भारत सदैव पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र रहा है। यहाँ प्रत्येक प्रदेश की अपनी विशिष्टता है, जिनमें मंदिर-निर्माण भारतीय वास्तुकला का सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधित्व करता है।
भारत की प्राचीन विद्याओं में स्थापत्य उपवेद एक विलक्षण विज्ञान है, जिसने भवन-निर्माण एवं वास्तुशास्त्र के सिद्धांतों को युगों से हमें प्रदान किया है। वास्तुकला पाँच महाभूत – पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश – पर आधारित है। इनका संतुलन भवन को शक्तिशाली, संतुलित तथा समृद्ध करता है। चूँकि भारत के प्रत्येक क्षेत्र की अपनी सांस्कृतिक परंपरा है, अतः मंदिर निर्माण की तीन प्रमुख शैलियाँ विकसित हुईं –
द्रविड़ शैली
नागर शैली
वेसर शैली
यहाँ हम द्रविड़ शैली पर विचार करेंगे।
द्रविड़ मंदिर वास्तुकला
द्रविड़ शैली मुख्यतः दक्षिण भारत की मंदिर वास्तुकला शैली है। इस शैली का प्रारंभ पल्लव और चोल शासकों ने किया। पल्लवों ने 7वीं शताब्दी ईस्वी में भव्य स्मारकों का निर्माण कराया। महेंद्रवर्मन एवं उनके पुत्र नरसिंहवर्मन कला एवं स्थापत्य के महान संरक्षक थे। चोलों ने पल्लवों से मिली परंपरा को और विकसित करते हुए द्रविड़ शैली को एक नई ऊँचाई प्रदान की।
इस कालखंड में—
गुफा मंदिरों की परंपरा से हटकर विशाल और सजावटी मंदिरों का निर्माण हुआ।
पत्थर को प्रमुख निर्माण सामग्री के रूप में अपनाया गया।
गोपुरम (प्रवेश द्वार टावर) मंदिरों की पहचान बन गए, जिन पर पुराणों से संबंधित सुंदर नक्काशी उकेरी जाती थी।
मूर्तिकला का प्रयोग अद्वितीय रूप से बढ़ा, जिससे मंदिर जीवंत प्रतीत होने लगे।
द्रविड़ शैली की प्रमुख विशेषताएँ

· परिसर एवं गोपुरम:ये मंदिर ऊँची प्राचीर से घिरे होते हैं और मुख्य प्रवेश द्वार पर भव्य गोपुरम स्थित होता है।
· विमान:गर्भगृह का शिखर विमान कहलाता है, जो सीढ़ीदार पिरामिडनुमा आकार में ऊपर की ओर उठता है।
· विशाल प्रांगण:मंदिर प्रांगण में अनेक छोटे-बड़े उपमंदिर, सभागृह, जलकुण्ड तथा लंबी दीर्घाएँ निर्मित होती हैं।
· स्तूपिका:शिखर के शीर्ष भाग पर मुकुट के समान लघु स्तूपिका स्थापित रहती है।
· जलाशय:मंदिर परिसर अथवा उसके आस-पास प्रायः एक बड़ा तालाब या कुण्ड अवश्य निर्मित होता है।
· द्वारपाल:गर्भगृह के प्रवेशद्वार पर भव्य एवं प्रभावशाली द्वारपाल मूर्तियाँ स्थापित रहती हैं।
द्रविड़ मंदिरों का वर्गीकरण
आलेख (लेआउट) के आकार के आधार पर द्रविड़ मंदिर निम्नलिखित प्रकारों में विभाजित किए जाते हैं:
1. कूट या चतुरश्र आकार (वर्गाकार मंदिर)
2. शाला या आयताकार आकार (आयताकार मंदिर)
3. गजपृष्ठ या वृत्तायात आकार (हाथी की पीठ समान अथवा दीर्घवृत्ताकार)
4. वृत्ताकार आकार मंदिर
5. अपसिडल (अर्धवृत्ताकार गुंबद वाले, जिनमें अश्वनाल आकार का प्रवेशद्वार होता है, जिन्हें नासी कहा जाता है)
6. अष्टकोणीय आकार मंदिर
प्रसिद्ध द्रविड़ मंदिर
द्रविड़ शैली के प्रमुख मंदिरों में—
तमिलनाडु का बृहदेश्वर मंदिर (तंजावुर)
मीनाक्षी मंदिर (मदुरै)
अन्नामलाईयार मंदिर (तिरुवन्नामलाई)
महाबलीपुरम का शोर मंदिर
ये मंदिर अपने ऊँचे पिरामिडनुमा गोपुरम, विस्तृत प्रांगण, कलात्मक मण्डपों एवं सूक्ष्म नक्काशियों के लिए प्रसिद्ध हैं।
दक्षिण भारतीय वास्तुकला ने समग्र रूप से भारतीय धरोहर एवं संस्कृति को समृद्ध करने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है।



Very informative.